बुधवार, 15 दिसंबर 2010

इतिहास गवाह है कि....

शहजादा सलीम के इश्क में दीवानी अनारकली  खुलेआम शहंशाह अकबर के खिलाफ  बगावत पर उतर आयी, एक मामूली सी कनीज़ अपनी हैसियत तक भूल गयी और भरे दरबार में चुनौती दे डाली अपने सम्राट को, अनारकली की इस गुस्ताखी की सजा उसे भुगतनी पड़ी और जीते-जी दीवार में चुनवा दी गयी, उसकी मौत के साथ ही अंत हो गया एक प्रेम कहानी का, क्योंकि अनारकली को दीवार में चुनवा देने का फरमान एक सम्राट की ओर से आया था, यही कारण था की इस फरमान के विरोध में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई लेकिन आज के सन्दर्भ में यदि इस प्रेम कहानी और इसके अंत को देखा जाए तो यह एक  आनर किल्लिंग अर्थात प्रतिष्ठा के लिए हत्या या फिर पुरुष प्रधान समाज में एक स्त्री पर किया गया अत्याचार ही कहलाएगा .
         बुनियाद पर निर्भर करता  है की इमारत किस बुलंदी को छुएगी, एक कनीज़ और एक शहजादे  की प्रेम कहानी का अंत यदि ऐसा होता है तो इसमें कोई आश्चर्य नही होना चाहिए निश्चित तौर पर अनारकली के साथ अन्याय हुआ था, यदि इश्क करना गुनाह है तो जाहिर है शहजादा  सलीम भी एक गुनहगार था और उसे भी सजा मिलनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ , क्या सलीम को इसलिये गुनहगार नहीं माना  जा सकता था  की वह एक शहजादा था ? या फिर वह पुरुष प्रधान समाज का नेतृत्त्व करता था ?
                    कौन गुनहगार था ? किसको सजा मिलनी चाहिए थी ? इस मुद्दे को आज के संदर्भ  में  नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में यदि हम उक्त घटना को देखें तो सरसरी तौर पर कहीं-न-कहीं अनारकली दोषी पाई जाती है, क्योंकि शहजादा सलीम की नजरों में अनारकली  महज एक जीती जागती कलाकृति भर थी ,एक शहजादे की नजरों में एक कनीज की हैसियत और हो भी क्या सकती थी  ?
अनारकली खुश थी, हो भी क्यों न ? आखिर एक शहजादा उससे प्रेम जो करने लगा था, वास्तव में देखा जाय तो शहजादा के प्यार ने ही उसे इतनी शक्ति प्रदान कर दी थी की अब वह न सिर्फ सम्राट का विरोध करने लगी थी बल्कि "पर्दा नहीं जब कोई खुदा से , बन्दों से पर्दा करना क्या ......."यहाँ पर अनारकली ने न केवल एक सम्राट को खुली चुनौती दी थी अपितु  उसने  तत्कालीन सामाजिक ताने-बाने को  भी तार-तार करने  का  असफल प्रयास किया था , क्या अनारकली या कोई और समाज से बढ़कर है , आपकी इच्छा है आप खुदा को मानें या ना मानें लेकिन सामाजिक कायदे-कानूनों का  निर्वाहन आपको करना ही होगा l 
हालाकि  मनुष्य को  सामाजिक प्राणी कहा गया है  किन्तु यदि आप पशु-पक्षियों की दुनियां में प्रवेश करेंगे तो पायेंगे की वहां पर भी सामाजिकता  (समूह ) की भावना पाई जाती है और उस समाज अथवा समूह का  सुचारू रूप  से संचालन हो सके इसके लिए उनके भी अपने कायदे-कानून देखे गए हैं और हर कोई इनका पालन करता है  ,लेकिन जब कभी कोई पशु या पक्षी उन  कायदे - कानूनों की अवहेलना करता है तो उसे दंड  दिया जाता है या फिर स्वयं ही उसे अपने किये की सजा किसी-न-किसी रूप में भुगतनी होती है, किन्तु दुर्भाग्य से आज मनुष्य  समाज में इन कायदे -कानूनों को खुलेआम  चुनौती दी जा रही है,यही कारण है की आज सामाजिक मूल्यों में निरंतर गिरावट आ रही है , अब देखिये ना साक्षात्कार में एक अभिनेत्री कहती है की  उसका जिस्म है , उसकी मर्जी है  वह चाहे अपने जिस्म का प्रदर्शन  करे या ढके....? क्या यह मानसिकता समाज के हित में उचित है ? क्या इस  प्रकार  की मानसिकता का विरोध करना उचित नहीं होगा ? क्या आपको पता है आपकी सरहद कहाँ पर खत्म होती है ?
मै मानता हूँ आधुनिक सभ्य भारत  में  प्राचीन भारतीय सामाजिक पध्दति का समर्थन करने वाली मानसिकता को रुढ़िवादी या संकीर्ण  विचारधारा   कहा जाने लगा है  लेकिन हमें यह नहीं भूलना  चाहिए की विश्व  में हमारी जो पहिचान है उसके लिए हमारी संस्कृती, हमारी परम्पराएँ और हमारी  सामाजिक संरचना को ही सारा श्रेय जाता है , राष्ट्र्मंडल खेलों के दौरान जब ३०-४०  करोड़ का बैलून हवा में छोड़ा गया तब यही  कहा गया की इससे  अंतराष्ट्रीय  स्तर पर भारत की पहिचान बनी है , भूमंडलीकरण के इस दौर में निश्चित तौर पर आज हमने आर्थिक तरक्की कर ली है लेकिन  धीरे- धीरे हमारी संस्कृती, हमारी परम्पराएँ और हमारी  सामाजिक संरचना इस   भूमंडलीकरण की आंधी  में बही  जा रही हैं.......l 
बहरहाल आज सलीम एवं अनारकली जैसे प्रेम प्रसंग निरतर बढ़ते जा रहे हैं , और कही-न कही हमारे बुद्धिजीवी ,हमारे विचारक और हमारा साहित्य भी इन प्रेम प्रसंगों का समर्थन  करता नजर आ रहा है  और इन्हें बढ़ावा देने का प्रयास  कर रहा है नतीजतन  आनर किलिंग अर्थात प्रतिष्ठा के लिए हत्या या फिर आत्महत्या जैसी घटनाएँ सामने आ रही हैं , कहीं पर अनारकली की हत्या कर दी जाती है और कहीं पर सलीम की ,हम में से कई शिक्षित एवं आधुनिक (Modern & Open Minded) सलीम  यां अनारकली के पक्ष में आकर खड़े हो जाते हो  लेकिन जिस अकबर ने सलीम (कालान्तर में जहाँगीर ) को इतने लाड-प्यार में  पाला -पोषा ,और सारे ऐशो-आराम की  सुबिधायें उसके आगे लाकर रख दिये तो क्या अकबर के प्रति कोई फर्ज नहीं बनता है शहजादा सलीम का ? आखिर क्यों हम  हमेशा  अनारकली या फिर सलीम का समर्थन करते हैं क्यों न हम कभी अकबर बनके ऐसे  प्रेम प्रश्नग और इनके अंत को देखकर कुछ सीखने का प्रयाश करते?  सुना है इतिहास से भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं l
    जो भी हो ! ऐसे प्रेम कहानियों का अंत अक्सर दुखद ही होता है और शर्मशार करती है मानवता को ! और कही-न कही ऐसी घटनाएँ समाज पर भी बहुत गहरा असर करती हैं l

    
                

16 टिप्‍पणियां:

  1. भूमंडलीकरण के इस दौर में निश्चित तौर पर आज हमने आर्थिक तरक्की कर ली है लेकिन धीरे- धीरे हमारी संस्कृती, हमारी परम्पराएँ और हमारी सामाजिक संरचना इस भूमंडलीकरण की आंधी में बही जा रही हैं.......हमें यह नहीं भूलना चाहिए की विश्व में हमारी जो पहिचान है उसके लिए हमारी संस्कृती, हमारी परम्पराएँ और हमारी सामाजिक संरचना को ही सारा श्रेय जाता है.... ......इतिहास से भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं ...
    .......ऐतिहासिक प्रष्ठभूमि को केंद्र में रखते हुए आधुनिकता की अंधीदौड़ में ग़ुम होती हमारी संस्कृति का बहुत अच्छा चिंतनप्रद आलेख बहुत अच्छा लगा ......

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  2. सलीम अनारकली के बहाने ओनर किल्लिंग पर तीखा प्रहार. .......... सवाल और भी हैं भाकुनी जी ! ......दोषी कौन- अनारकली? सलीम? या बादशाह अकबर? बादशाह के मन में भावनाओं का कोइ स्थान नहीं था. जोधा बाई से शादी भी एक समझौते के तहत थी...... ऐसे में अनारकली का सलीम से निकाह तो फायदे का सौदा साबित न होता......बहरहाल, बहस लम्बी है......
    आप इसी तरह लिखते रहें, इन्ही शुभकामनाओं के साथ. -

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  3. बहुत बढ़िया विचारणीय पोस्ट लिखी है।बधाई स्वीकारें।

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  4. आधुनिकता की अंधीदौड़ में ग़ुम होती हमारी संस्कृति का बहुत अच्छा चिंतन! बहुत अच्छा लगा| बधाई |

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  5. .

    एक बेहतरीन अंदाज़ में प्रेम परिणितियों को जाहिर किया है। जो शक्तिशाली है , उसका कोई गुनाह नहीं माना जाता। इसीलिए सलीम को प्यार करने के गुनाह में पूरी सलतनत और अनारकली को मौत मिली। ऐसा ही हो रहा है आज के समाज में भी । पढ़े लिखे लोग अपनी बहन ki ऑनर किलिंग कर रहे हैं और पति अपनी पत्नी को टुकड़ों में काट रहे हैं। शक्तिशाली होने का नाजायज फायदा सदियों से लेते रहे हैं लोग।

    .

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  6. achi post lagi, jayadatar log aisa apni jhoothi shaan or ijaat ke naam pe karte hai..jo ki galat hai..

    mere blog par bhi kabhi aaiye
    Lyrics Mantra

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  7. मन को उद्वेलित कर गया आपका पोस्ट !
    पोस्ट सामयिक और प्रासंगिक है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  8. @ Harman ji blog pe aaye aapka dhanyvaad.

    @ ज्ञानचंद मर्मज्ञ ji aapka is blog pe aane hetu abhaar vyakt krta hun, ummid hai margdarshan krte rahenge,

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  9. पोस्ट लाजवाब... तीखा प्रहार...
    मैं सुबीर जी से पूर्णतया सहमत हूँ...

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  10. आपसे सहमत हैं ,लिखा अच्छा है ...

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  11. आपको एवं आपके परिवार को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें !

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  12. भाकुनी जी!
    सलीम एवं अनारकली के प्रेम को अकबर की दृष्टि से देखने का आपने आह्वान् किया है..अच्छा है। पर प्रश्न यह है कि सलीम अनारकली से प्रेम क्या इसलिये न करे कि वह एक बादशाह का बेटा है.या अनारकली सलीम से इसलिये प्रेम न करे कि वह उसके आगे कहीं नहीं ठहरती? क्या वास्तव में प्रेम हैसियत देखकर किया जाता है? यदि ऐसा है तो हम प्रेम को एक सौदा, क्रय-विक्रय का नाम क्य्तों न दें.प्रेम जैसे पवित्र शब्द को अपवित्र क्यों करें? यदि प्रेम नाप-तौल के सायास किया जाता है तो ‘सहज’ आदि शब्द हमारी संस्कृति में क्यों हैं?
    रही बात अकबर की दृष्टि एवं उनकी आँख की.....................तो इन मुगल बादशाहों के हरम औरतों से भरे क्यों होते थे? क्या स्त्री कोई नाप-तौल की चीज़ है? अपने हरमों में वृद्धावस्था तक नवयौवना बीबियों को लाते हुए.....नित नये निकाह पढ़वाते हुए क्या इन तथाकथित ऑनरवालों को ऑनर का ध्यान नहीं आया?
    और आपको भी इतिहास में कोई ऐसा अन्य प्रसंग नहीं मिला जिसे उठाया जा सके.........मात्र इन्हीं स्त्री उपभोक्ताओं का प्रसंग मिला जिसे ऑनर की मिसाल दी जाये?

    अनारकली को देखते हुए आपको शकुन्तला.....देवयानी तथा दमयन्ती का प्रसंग नहीं दिखा?

    क्या आप मानते हैं कि प्रेम एक हृदयानुभूति नहीं है, इसे एक कार्यक्रमानुसार सम्पादित किया जाता है। प्रत्येक वस्तु के समान यह भी बाज़ारी चीज़ है।
    यदि आप ऐसा समझते हैं तथा आपके दृष्टि में ऑनर किलिंग एवं समाज में व्याप्त कुंठा का एकमात्र यही समाधान दिखता है कि लोग प्रेम करना छोड़ दें और अपनी हैसियत तथा जाति धर्म के अनुसार प्रेम करें तो सम्भवतः यह भी सत्य है कि आपने कभी प्रेम किया ही नहीं होगा......क्योंकि ऐसा वही कह सकता है जिसे प्रेम की अनुभूति न हुई हो.......अथवा यदि हुइ भी होगी तो अपनी हैसियत के अनुसार................

    कुछ समाजिक कुरीतिया‘ं हैं जो सर्वदा समाज में रही हैं.हाँ ये बात और है कि हामारे आचार्यों ने उनका वर्णन न्करते हुए उन्हें एक सभ्य व्यक्ति के लिये निषिद्ध बताया है..........................बार-बार, स्थान-स्थान पर उनकी निन्दा की है............परन्तु निष्कलंक चन्द्र की तो आशा भी नहीं की जा सकती । ये बात और है कि हो सकता है कि चन्द्र का कलम्क दिे न समाज के सामने न आये।

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  13. @ वीना जी
    @ शारदा अरोरा जी
    @ मुस्कान जी
    आप मेरे ब्लॉग पर आए और अपनी बहुमूल्य प्रतिकिर्या व्यक्त की जिसके लिए मै ह्रदय से आपका आभार व्यक्त करता हूँ ,

    @ बेनामी जी
    सर्वप्रथम आप मेरे ब्लॉग पर आए और अपनी बहुमूल्य प्रतिकिर्या व्यक्त की जिसके लिए मै ह्रदय से आपका आभार व्यक्त कर्ता हूँ , उमीद है मार्ग दर्शन करते रहेंगे,,,,
    @ बेनामी जी ! आपके नजरिये से देखने पर हो सकता है मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग कर गया हूँ और सलीम ,सम्राट अकबर या फिर अनारकली पर ज्यादती कर गया हूँ , लेकिन जिस मानसिकता मैं मैंने उपरोक्त पोस्ट लिखी है यदि उसी मानसिकता मैं आप उसे पढेंगे तो मुझे यकीन है किसी भी प्रकार की बहस की गुंजाईश नहीं रहेगी , स्पष्ट तौर पर कहूँ तो इश्क,प्यार और मुहबत के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है इस दुनिया में,
    छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए , ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए ...........मुझे लगता है कही - न- कही इश्क,प्यार और मोहबत की परिभाषा को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता रहा है , मानसिक विकृति और शारीरिक आकर्षण को अक्सर प्यार की इन्तेहाँ के रूप में प्रचारित किया जाता है, जो किसी भी देश और समाज के हित मैं अक्सर घातक ही साबित हुआ है, और कही न- कही तथाकथित प्रेमियों के व्यक्तिगत जीवन को भी प्रभावित करता है आदि...............
    बहरहाल बेनामी जी समयाभाव के कारण मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दे पा रहा हूँ जिसका मुझे खेद है लेकिन
    बेनामी के रूप मैं भी जिस गरिमा और शालीनता से आपने टिपण्णी व्यक्त की है वह बयाँ कर रही है आपके व्यक्तित्व की, और एक मिसाल है उन लोगों के लिए जो प्राय: इस बेनामी शब्द का दुरूपयोग करते देखे गए हैं , उम्मीद है इसी प्रकार भविष्य मैं भी मनोबल बढ़ाते रहेंगे.

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  14. भाकुनी जी!
    आप जो बात कहना चाह रहे हैं वह हमारी समझ में आ रही है। परन्तु आपने जो कुछ भी लिखा है अपने ब्लॉग में वह आपके भावों को सम्यक् रूप से पाथकों के समक्ष उपस्थापित करने में असमर्थ है, प्रथम दृष्ट्या उसका बहुत भ्रामक संदेश जाता है। परन्तु आपकी बात उसके लिये सहज ही संप्रेषणीय है जो आपके सभी पोस्ट से एवं समग्र लेखन व विचारधारा से परिचित है। अतः मेरे लिये आप क्या कहना चाहते हैं.....आपके भाव क्या हैं.क्या विचार आप पाठकों के समक्ष रखना चाहते हैं इसे समझना कठिन नहीं है।
    वस्तुतः आप उस प्रेम के विरोधी हैं जिसकी सीमा शरीर से प्रारम्भ होती है एवं शरीर पर ही समाप्त होती है। जो एक सुन्दर देहयष्टि तक सीमित रहती है। अन्तस् से जिसका कोई सरोकार नहीं होता। जिसमें वासना की बू आती है। जहाँ खिलौनों एवं हृदयानुभूति में अन्तर नहीं होता। जहाँ स्त्री एक वस्तु समझी जाती है। उसे सदा भोग्या समझा जाता है। हम उस बाज़ारवाद की बात नहीं कर रहे हैं.................बाज़ारवाद से हमारा भी विरोध है। एक सभ्य, सजग व्यक्ति से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह समाज की कुरीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाये.......उसके हल का उपाय सुझाये तथा उस पर कारगर कदम भी उठाये।

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