शुक्रवार, 23 मार्च 2012

लिखते-लिखते .........

ममता  की   धमकी
                  माया    की      हार,
                               दलितों की बस्ती से

                                            राहुल   का    प्यार,
कहते    थे  वो   हैं 
                 बेहद         जरुरी,
                               उनके  बिना जीत
                                            आधी   -   अधूरी  
वादों  की  झड़ियाँ,
                विवादों    के  रेले,
                              लगते  हैं  जब भी
                                          चुनावों  के   मेले,
करते     हैं   वादे
                निभाते  नहीं  हैं,
                              मुडकर  ये  सूरत
                                               दिखाते  नही   हैं,
किस्से हजारों हैं
                 कुर्सी   के   यारो,
                                   इसके  दीवानों को 

                                                    पत्थर   न   मारो.

          सभी ब्लोगर, पाठकों एवं देश वासियों को नवसंवत्सर २०६९   की हार्दिक शुभकामनाएँ| 


28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद् की आप मेरे ब्लॉग पे पधारे और अपने विचारो से अवगत करवाया बस इसी तरह आते रहिये इस से मुझे उर्जा मिलती रहती है और अपनी कुछ गलतियों का बी पता चलता रहता है
    दिनेश पारीक
    मेरी नई रचना

    कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: माँ की वजह से ही है आपका वजूद: एक विधवा माँ ने अपने बेटे को बहुत मुसीबतें उठाकर पाला। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। बड़ा होने पर बेटा एक लड़की को दिल दे बैठा। लाख ...

    http://vangaydinesh.blogspot.com/2012/03/blog-post_15.html?spref=bl

    उत्तर देंहटाएं
  2. सटीक लिखा है...नवसंवत्सर की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर कविता जी ! आप को भी नव वर्ष की शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या करें यही सब सहने को देशवासी अभिशप्त है ! खैर, अच्छा कविता व्यंग्य ! आपको भी इस नव बेला की शुभकामनाये !

    उत्तर देंहटाएं
  5. जनता सबक सिखाती तो है,मगर बार-बार नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर व्यंग्य| नवसंवत्सर २०६९ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  7. सटीक रचना ...नव वर्ष की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  8. ..वादों की झाड़ियाँ विवादों के रेले,
    लगते हैं जब भी चुनावों के मेले,....
    बसंत ऋतु में राजनीति पर एक चुटीला व्यंग्य. आभार !
    रचना में "...वादों की झाड़ियाँ..." नहीं "...वादों की झड़ियाँ...." होना चाहिए था. कृपया देखें.

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर प्रस्तुति..बहुत-बहुत बधाई । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेहतरीन रचना...आपको भी हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  11. steek prastuti... aapko bhi nav samvatsar ki shubhkamnaayen.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!
    नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत बढ़िया....
    सटीक......

    आपको भी नव संवत्सर की शुभकामनाएँ.
    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  14. वाह !!!!! बहुत सुंदर रचना,क्या बात है,बेहतरीन भाव अभिव्यक्ति,

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: तुम्हारा चेहरा,

    उत्तर देंहटाएं
  15. सुन्दर सटीक रचना..भाकुनी जी ! बहुत सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  16. सटीक ...बहुत बढ़िया लिखा है ...
    बधाई एवं शुभकामनायें ...

    उत्तर देंहटाएं
  17. वाह ! ! ! ! ! बहुत खूब सुंदर रचना,
    समर्थक बन गया हूँ,इसी तरह स्नेह बनाए रखे,...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  18. पी.एस भाकुनी जी
    नमस्कार !!
    पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    सुंदर शब्दावली प्रेरणादायक कविता ....रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

    उत्तर देंहटाएं
  19. सटीक ब्यंग युक्त अत्यंत चुटीली अभिव्यक्ति !!!पिछले कुछ दिनों से अति व्यस्तता के कारण ब्लॉग पर आना न हो सका क्षमा सहित ....

    उत्तर देंहटाएं
  20. pathhar ke alawa aur kisi ke layak hai bhi nahi ye kursi ke deevane...bahut achchi prastuti

    उत्तर देंहटाएं
  21. सटीक ! बहुत बढ़िया ,बधाई एवं शुभकामनायें ...

    उत्तर देंहटाएं
  22. तीखा सन्देश देती छोटी सी रचना के लिए बधाई आपको ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. बहुत ही बढ़िया व्यंग किया है
    बढ़िया प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं