रविवार, 29 अप्रैल 2012

प्रयाश्चित……


प्रदुषण एवं शहर  के कोलाहल से दूर  अत्यंत  शांत एवं रमणीक स्थान ! यहाँ से चतुर्दिक प्राक्रतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है, शहर के तमाम धनाड्य व्यापारियों, और अधिकारीयों की पहली पसंद ! यहीं पर स्थित है शहर के जाने-माने अधिवक्ता शर्मा जी का आलिशान बंगला, आज बंगले में काफी चहल-पहल है , सुबह से ही आने-जाने वालों का ताँता लगा है....सदैव सामाजिक कार्यों में बढ़-चदकर भाग लेने वाले नेकदिल,परोपकारी एवं मृदु भाषी शर्मा जी को कौन नहीं जनता है इस शहर में ? 
ईश्वर की कृपा कहो या स्वयं शर्मा जी की कड़ी मेहनत ! आज क्या नहीं है शर्मा  जी के पास ? हँसता-खेलता,साधन-संपन्न परिवार में पुत्र-पुत्री एवं मियां-बीबी के अतिरिक्त खुबसूरत,आलिशान बंगला,चमचमाती विदेशी कार, करोड़ों का बैंक बैलेंस और हर पल साए  की भांति आगे-पीछे मडराने वाले आज्ञाकरी  नौकर-चाकर .....अपनी इस उपलब्धि पर  अक्सर शर्मा जी कहा करते हैं "वो आज जो भी हैं  अपनी मां की मेहनत और  आशीर्वाद से हैं........" बचपन में पिता  की मृत्यु के बाद भी माँ ने जिस अथक परिश्रम एवं मेहनत से अपने इकलौते बेटे की परवरिश की और उसे बेहतर शिक्षा एवं संस्कार दिए कदाचित शर्मा जी का कहना उचित भी है, शायद यही वजह रही होगी की शहर की बेसहारा,बेघर एवं उपेक्षित महिलाओं के हित में कुछ कर गुजरने का जज्बा एक सपना बन कर शर्मा जी के दिल में विगत कई वर्षों से पल रहा था ...
        ममता सदन ! जी हाँ ! ममता  सदन ! जहाँ पर आश्रय मिलेगा उपेक्षित, बेसहारा एवं बेघर भटकती हुई माताओं को  !  ममता सदन ! जहाँ पर आश्रय मिलेगा एक माँ और उसकी ममता को ! शर्मा जी का सपना 'ममता सदन' की खुबसूरत भव्य ईमारत के रूप में बनकर तैयार है, मुख्य अथिति के तौर पर शहर के मेयर के अतिरिक्त कई और भी प्रतिष्ठित   नाम शर्मा जी के जेहन में थे किन्तु श्रीमती जी का सुझाव शर्मा जी को बेहद पसंद आया लिहाजा शर्मा जी ने गाँव से अपनी ७० वर्षीय माँ को मुख्य अथिति के तौर पर आमंत्रित किया है ! निसंदेह ! माँ को गाँव से बुलवाकर शर्मा जी ने अपनी माँतृ भक्ति का परिचय दिया है  l
       उधर गाँव में  बुढ़िया यह सन्देश पाकर  जैसे निहाल हो गई, बुढ़िया ही क्यों ? खबर सुनकर तो पूरा गाँव ही खुश था, चलो अच्छा  हुआ, यहाँ गाँव में  कौन इस बुढ़िया की देख-भाल करेगा ? अच्छा है कम से कम अपनी रही-सही जिन्दगी तो अपनी बहु-बेटे संग जी लेगी ! कल ही गाँव का कोई जिम्मेदार व्यक्ति इसे शहर  छोड़ आएगा इसके बहु-बेटे के पास, चलो देर   आयद  दुरुस्त आयद, पूरे पन्द्रह वर्षों के बाद बेटे ने उसकी सुध जो ली है, लेकिन बुढ़िया का  संदेह अब भी बरकरार है, न जाने क्यों इतने सालों बाद उस बेवकूफ को बेसहारा, बूढी माँ की याद आई ? वहां  न जाने बहु उसके साथ कैसा व्यवहार करेगी ? कितना सताया था उन दोनों ने मुझे ! जब नई-नवेली बहु  बनकर घर में आई थी ? तो क्या इन वर्षों में उसकी बहू-बेटे को उनकी गलतियों का अहसास हो चुका है ? बच्चे थे ! नादान  थे ! यह उम्र ही ऐसी होती है की भले-बुरे का ज्ञान ही नहीं होता है ! बहु-बेटे दोनों पढ़े-लिखे हैं, अब समझदार हो गए होंगे ! बुढ़िया ने इत्मीनान की सांस ली और  आनन -फानन  में शहर जाने की  तैयारी में जुट गई........  l
      आज 'ममता सदन' का  उद्घाटन होना है , फूल-पताकाओं और रंग-बिरंगी विद्युत लड़ियों से 'ममता संदन को ढक दिया गया है, खूबसूरती देखते ही बनती है 'ममता सदन की ! स्थानीय सांसद, विधायक, शहर के मेयर और तमाम सरकारी एवं
,गैर सरकारी विभागों  के आला अधिकारीयों  के अतिरिक्त प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों के अतिरिक्त कई भूले-भटके  एवं बेसहारी  महिलाएं और बच्चे भी उद्घाटन समारोह में शामिल हैं,

एक मैली-कुचैली फटी-पुरानी धोती में लिपटी हुई एक ७० वर्षीय बृद्ध महिला ने परम्परागत तरीके से पूजा अर्चना के पश्चात "ममता सदन" में प्रवेश किया, निश्चित ही कोई बेसहारा,बेघर बेचारी होगी जिसको  इस ममता सदन की प्रथम मेहमान होने का श्रेय प्राप्त हुआ  है....मेहमानों में खुसर-फुसर होनी आरम्भ हो चुकी है " कितने उच्च विचार हैं शर्मा जी के......?  एक ७० वर्षीय बेसहारा,बेघर बृद्ध महिला के कर कमलों से "ममता सदन' का उद्घाटन करवाकर शर्मा जी ने मातृत्व के प्रति अपनी शर्द्धा एवं भक्ति का परिचय दिया है....और भी तरह-तरह के कयास लगाये जाने अभी शेष थे की सदन की बालकनी में उस बृद्ध महिला के साथ  स्वयं शर्मा जी     उपस्थित हुए  और मेहमानों को संबोधित करना आरम्भ कर दिया............  आज मैंने जाना की "मां ! सिर्फ मां होती है ! उसकी हर धडकन अपने शिशु के लिए धडकता है,  आप लोगों के लिए आज मैं एक सफल अधिवक्ता हूँ, लेकिन  आज भी  माँ के लिए मैं एक नटखट,  शरारती  बच्चे से कम नहीं हूँ , वही नटखट शरारती बच्चा जो आज से कई साल पहले अपनी विधवा माँ को मामूली सी बात पर बेसहारा छोड़ आया था  गाँव में....... मैं मानता हूँ इस शहर  में आकर मैंने वह सब कुछ पाया जिसके लिए मैंने बचपन से ही सपने संजोने आरम्भ कर दिए थे.....कदाचित मेरे उन सपनो  में कही-न-कही मेरी माँ भी शामिल रहती थी प्रत्यक्ष्य  या परोक्ष्य रूप में ......जीवन काल की इस अवधि में मैंने क्या खोया और क्या  पाया ? आज जब कभी फुर्सत के क्षणों में सोचता हूँ  तो समझ में आता है की" धन-दौलत, इज्जत-शोहरत सब कुछ तो है मेरे पास शिवाय ममता के.......शर्मा जी की आँखें नम हो आई.. इससे पहले की माहौल और भी भावुक  हो जाता ......
        खैर छोड़ो ! मैं आपको बता देना चाहता हूँ की 'ममता सदन' में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला कोई और नहीं बल्कि स्वयं मेरी माँ है जो आज ही गाँव से आई है और अब माँ यहीं रहेगी, इसी शहर में.......किन्तु ममता सदन में नहीं अपितु मेरे बंग्ले में, मेरे घर में ..... अरे सुनो.......'ममता सदन' का बोर्ड उतरवाकर कर मेरे बंग्ले के मुख्य द्वार पर टांक दो.. और हाँ आचार्य जी से निवेदन कर "सदन"  के लिए कोई और अच्छा सा नाम सूझा  लेना......l


10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर दिल को छूती प्रस्तुति,..बेहतरीन पोस्ट

    MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

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  2. कहानी के अंत में जो मोड़ था वह अच्छा लगा | माँ तुझे सलाम ,सुंदर और संवेदनशील रचना बधाई

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  3. दिल को छूती हुई मर्मस्पर्शी सुन्दर प्रस्तुति,......

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  4. बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति //कहानी का अंत अच्छा लगा //

    MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

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  5. कल ही गाँव का कोई जिम्मेदार व्यक्ति इसे शहर छोड़ आएगा इसके बहु-बेटे के पास, चलो देर आये दुरुस्त आये, पूरे पन्द्रह वर्षों के बाद बेटे ने उसकी सुध जो ली है, लेकिन बुढ़िया का संदेह अब भी बरकरार है, न जाने क्यों इतने सालों बाद उस बेवकूफ को बेसहारा, बूढी माँ की याद आई ...
    ..der se sahi koi beta maa ko samjh leta hai to isse achha aur kuch nahi... maa bhale hi kaise bhi haalaton se gujre lekin beta ka bura kabhi nahi sochi-karti...
    ..bahut badiya marmsparchi prastuti

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  6. सत्य कटाक्ष, कमोबेश यही स्थिति है !

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  7. आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

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  8. वृद्धों की देखभाल बच्चे की देखभाल से भी अधिक कठिन है. पहले संयुक्त परिवारों में देखभाल करने वाले अधिक होते थे. अच्छी कहानी है.
    घुघूतीबासूती

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